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Showing posts from April, 2018

निकलकर झोपड़ों से जब से शहर में आ गए

निकलकर झोपड़ों से जब से शहर में आ गए, सुख चैन जिंदगी के ना जाने कहां गए।  हवा यहां पर अब लगती नहीं है,  धूप जैसे यहां निकलती नहीं है , शाम के वो खाली पल ना जाने कहां गए, निकलकर झोपड़ों से जब से शहर में आ गए , सुख चैन जिंदगी के ना जाने कहां है । स्वाद रोटियों में यहां आता नहीं है,  बुरा के साथ चावल कोई खाता नहीं है, गिंदोड़े वो  गुड़ के ना जाने कहां गए,  निकलकर झोपड़ों से जब से शहर में आ गए, सुख चैन जिंदगी के ना जाने कहां गए।