गुजर गयी ये शाम भी हर शाम की तरह अपने ही शहर मे हूँ गुमनाम की तरह दीवारे बंद कमरे की कुछ बोलती नही आँखे एक दूसरे को टटोलती नही मुस्कान होठो पर खोलती नही रात बढ गयी है बढते दाम की तरह गुजर गयी ये शाम भी हर शाम की तरह अपने ही शहर मे हूँ गुमनाम की तरह छायी है उदासी सबके चहरे उदास है सब कुछ है फिर न जाने किसकी तलाश है भाग दौड़ कर बुझ जायेगी ये कैसी प्यास है इच्छा बढ गयी है बढते नाम की तरह गुजर गयी ये शाम भी हर शाम की तरह अपने ही शहर मे हू गुमनाम की तरह .
यह हिन्दी कविताओं और शायरी का संग्रह है जो मेरे अपने अनुभव से लिखे गये है