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निकलकर झोपड़ों से जब से शहर में आ गए

निकलकर झोपड़ों से जब से शहर में आ गए,
सुख चैन जिंदगी के ना जाने कहां गए।

 हवा यहां पर अब लगती नहीं है,
 धूप जैसे यहां निकलती नहीं है ,
शाम के वो खाली पल ना जाने कहां गए,
निकलकर झोपड़ों से जब से शहर में आ गए ,
सुख चैन जिंदगी के ना जाने कहां है ।

स्वाद रोटियों में यहां आता नहीं है,
 बुरा के साथ चावल कोई खाता नहीं है,
गिंदोड़े वो  गुड़ के ना जाने कहां गए,
 निकलकर झोपड़ों से जब से शहर में आ गए,
सुख चैन जिंदगी के ना जाने कहां गए।

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